Friday, July 31, 2009

एक हास्य-गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ आलोचना का स्वागत है !

" एरियर की उड़ान "

प्रिये न चिंता करना तुम एरियर शीघ्र आनेवाला है

टी० वी० फ्रिज का स्वप्न पुराना अब रंग लाने वाला है

अर्थ-तंत्र हो भले जूझता दुखदायी महेंगाई से ,

किंतु प्रशासन सरकारी झंडा फहराने वाला है

कुछ जुगाड़ कर जोड़ तोड़ कर बिल-बाबू को पटा लिया है,

थोडी बहुत धौस पट्टी से काम निकल आने वाला है

बनिए से मन-माफिक चीज़ें सब उधार लेलेना तुम,

चेक मिलते ही समझो क़र्ज़ उतर जाने वाला है

एक दो नहीं दर्ज़न भर साड़ी की बुकिंग करा देना ,

देर सवेर हुई तो क्या सावन सठियाने वाला है

घटिया चप्पल, बिछिया पायल सभी बादल दूँगा आकर ,

हाथ तुम्हारा चूड़ी कंगन से लद जाने वाला है

रक्षा-बंधन पर ढेर मिठाई मंगवा कर रख लेना तुम,

बेरोज़गारी का मारा वह आख़िर मेरा साला है

कमल

Wednesday, July 22, 2009

कविता - अस्ताचलगामी

"अस्ताचलगामी " मेरे देवता ! तुमने, मुझसे कुछ माँगा नहीं , मैंने ही सदा तुमसे बहुत कुछ पाया है , अंतस में तुमने जो पीड़ा-लोक धर दिया अक्षर अक्षर वही ढर कर बाहर आया है ह्रदय की कसक पलकों में समेट दृग-जल भर लिए , छटपटाती आह ने सृजन की चाह ने वेदना को स्वर दिए गीतों में उभरा जो तुम्हारा ही साया है ! मुझमें तुम्हारी अमानत जो शेष है मैंने वह तुम्हें ही सौपने की ठानी है क्योंकि मेरी काया में समाया तुम्हारा सूर्य संध्या की छाया में अब अस्ताचलगामी है कमल

Saturday, July 18, 2009

प्रस्तुत कविता " अहिल्या का रोष " नारी की अस्मिता और स्वाभिमान की अभिव्यक्ति है आपकी प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है अहिल्या का रोष तुमने धरे चरण मुझ पर , जग ने कहा मैं तर गयी , पाषाण-प्रस्तर से पुनः नारी अहिल्या बन गयी मतिहीन गति अवरुद्ध थी निष्पंद थी निष्प्राण थी, अब हो गई वह शुद्ध क्या अभिशप्त जो पाषाण थी ? एक अबला पर निरंतर पुरूष-पौरुष का प्रदर्शन , दंड की भागी वही क्यों क्या यही है न्याय-दर्शन ? बन गई पत्थर वहीँ सुन मनुज का वह श्राप , मौन हो सहती रही सब शीत वर्षा ताप का संताप पुरूष-प्रधान व्यवस्था में क्यानारी के ही लिए दंड हो ? जैसे नारी नारी न हो, चिर-अभिशप्त शिला-खंड हो ? छल किया ,वह पा गया नभ का अतुल साम्राज्य , और मैं जो छली गयी वह बनी क्योंकर त्याज्य ? इस समाज के शब्द-कोष में पतिव्रता के साथ पत्नीव्रता , जुड़ न पाया शब्द अब तक हुई नारी ही कलंकित सर्वदा पाषाणों की भी गरिमा है यद्यपि मूक अंतर्मुखी हैं, पर छिपे इनके गर्भ में आक्रोश के ज्वालामुखी हैं जब कभी फट जायेंगे यह तब प्रलय मच जायगी। उस दिन तुम्हारी स्रष्टि क्या संहार से बच पाएगी ? मैं बनी पाषाणी तो क्या चाहा न था यों मुक्त होना अस्मिता तज चरण-रज से मॉस-मज्जा -युक्त होना नहीं राम ! पग-धूलि नहीं अब समता का व्योहार चाहिए, नर -समाज में बराबरी का स्वयं-सिद्ध अधिकार चाहिए जन्म-सिद्ध अधिकार चाहिए कमल ahutee@gmail.com

Thursday, July 16, 2009

बरसो रे घन

बरसो रे घन ! अभिषिक्त करो तुम प्रकृति-नटी का चिर-सुरमई सलोनापन बरसो रे घन ! कब तक बोझिल अंतरतम में, भरे रहोगे वर्षा का जल कब तक प्यासा बना रहेगा, तप्त-धारा का अंतस्तल ? कब तक सूनी राह निहारेगा, विरही मन ! आओ प्रियतम ! बरसो रे घन सभी दिशाओं का काजल आँचल में समेट बरबस कब तक पावस की पूनम, बनी रहेगी रात अमावस ? मन बंदी असहाय सघन-घन चंदा बंदी बदली-वन ! व्याकुल चकोर मन ! बरसो रे घन ! मनुहारों में घुट कर साजन, बीत न जाए सारा सावन पल पल बेकल बाट जोहता मेरा विव्हल अनुरागी मन ! चिर-अतृप्त रस-सिक्त करो, प्राणों को परितृप्त करो ऋतु बने सुहावन ! बरसो रे घन ! कमल घन चकोर मन !